सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: शादी के सच्चे वादे से बाद में मुकरना मात्र धारा 69 BNS का अपराध नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने Kunal Rameshbhai Kalyani v. State of Gujarat & Anr., में धारा 69, भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की महत्वपूर्ण व्याख्या की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि शादी का वादा शुरुआत में वास्तविक और ईमानदार था, लेकिन बाद में परिस्थितियों के कारण विवाह नहीं हो सका, तो मात्र वादे से मुकरना धारा 69 BNS के तहत “deceitful means” का अपराध नहीं बनता।
धारा 69 BNS पर सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणी
धारा 69 BNS ऐसे यौन संबंध को अपराध बनाती है, जिसमें महिला की सहमति छलपूर्ण साधनों (deceitful means) या विवाह करने का ऐसा वादा करके प्राप्त की गई हो जिसे करते समय ही पूरा करने का कोई इरादा न हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान में महत्वपूर्ण तत्व यह है कि वादा शुरू से ही झूठा अथवा धोखे की नीयत से किया गया हो।
इसलिए केवल यह तथ्य कि बाद में विवाह नहीं हुआ या आरोपी ने शादी करने से इनकार कर दिया, अपने-आप धारा 69 BNS लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
“False Promise” और “Breach of Promise” में अंतर
कोर्ट ने Deepak Gulati v. State of Haryana के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत को यह देखना होगा कि वादा किए जाने के समय आरोपी की वास्तविक मंशा क्या थी।
यदि शुरुआत से ही आरोपी का विवाह करने का कोई इरादा नहीं था और उसने केवल महिला को यौन संबंध के लिए तैयार करने के उद्देश्य से झूठा वादा किया था, तो मामला धारा 69 BNS के दायरे में आ सकता है।
लेकिन यदि वादा ईमानदार नीयत से किया गया था और बाद में किसी अप्रत्याशित परिस्थिति के कारण पूरा नहीं हो सका, तो इसे स्वतः धोखा नहीं माना जा सकता।
मां की आपत्ति के कारण विवाह न होना
इस मामले में शिकायत के अनुसार आरोपी ने बाद में अपनी मां की अनुमति न मिलने के कारण विवाह करने से इनकार किया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह परिस्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि यदि विवाह का वादा किया भी गया था, तो वह अच्छी नीयत से किया गया था, न कि शुरू से धोखा देने के उद्देश्य से।
FIR क्वैश
सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत में ऐसे पर्याप्त तथ्य नहीं पाए जिनसे यह स्थापित हो कि आरोपी ने शुरुआत से ही विवाह करने का कोई इरादा न रखते हुए धोखे से यौन संबंध स्थापित किया था। कोर्ट ने संबंध को शिकायत में वर्णित परिस्थितियों के आधार पर consensual relationship माना और Section 69 BNS के तहत दर्ज FIR को quash कर दिया।
कानूनी निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का मुख्य सिद्धांत यह है कि:
हर असफल विवाह-वादे को “false promise to marry” नहीं माना जा सकता।
धारा 69 BNS लागू करने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि विवाह का वादा करते समय ही आरोपी की नीयत उसे पूरा करने की न हो और उसी धोखे के आधार पर महिला की सहमति प्राप्त की गई हो। बाद में परिस्थितियों के कारण विवाह न हो पाना मात्र धारा 69 BNS के तहत अपराध नहीं बनाता।
केस: Kunal Rameshbhai Kalyani v. State of Gujarat & Anr.
निर्णय: Supreme Court of India
जजमेंट कॉपी लोड करने का लिंक
https://scourtapp.sci.gov.in/supremecourt/2026/34380/34380_2026_6_48_74010_Judgement_07-Sep-2026.pdf
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