चेन्नई, 31 अगस्त 2026: मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल फिलिस्तीन के समर्थन में नारे लगाने और वहां के लोगों के समर्थन में आवाज उठाने मात्र से किसी सभा को भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत स्वतः “Unlawful Assembly” (गैरकानूनी सभा) नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति G.K. Ilanthiraiyan की एकल पीठ ने P.P. Mohamed एवं अन्य बनाम State मामले में Crl.O.P. No. 24299 of 2026 को स्वीकार करते हुए Gudalur Judicial Magistrate के समक्ष लंबित STC No.201 of 2026 को याचिकाकर्ताओं के संबंध में निरस्त कर दिया। आदेश दिनांक 31.08.2026 है।
क्या था मामला?
अभियोजन के अनुसार, 05 अक्टूबर 2025 को शाम लगभग 6 बजे याचिकाकर्ताओं ने कथित रूप से एकत्र होकर फिलिस्तीनी लोगों के समर्थन में तथा उनके विरुद्ध किए जा रहे कथित नरसंहार के विरोध में नारे लगाए थे।
इस घटना के संबंध में Gudalur Police Station में Crime No.269 of 2025 दर्ज किया गया। पुलिस ने याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध Sections 189(2) और 126(2) BNS (आईपीसी की धारा 142-143, 341) के तहत अपराध दर्ज किया। बाद में पुलिस द्वारा दाखिल अंतिम रिपोर्ट पर Judicial Magistrate, Gudalur ने संज्ञान लेते हुए STC No.201 of 2026 में कार्यवाही आगे बढ़ाई।
क्या है 189(2) BNS
"(2) Whoever, being aware of facts which render any assembly an unlawful assembly, intentionally joins that assembly, or continues in it, is said to be a member of an unlawful assembly and such member shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to six months, or with fine, or with both."
क्या है 126(2) BNS
(2) Whoever wrongfully restrains any person shall be punished with simple imprisonment for a term which may extend to one month, or with fine which may extend to five thousand rupees, or with both.
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के समक्ष Section 528 BNSS (सीआरपीसी की धारा 482) के तहत याचिका दाखिल कर इस आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने की मांग की।
हाईकोर्ट ने ‘Unlawful Assembly’ की परिभाषा पर क्या कहा?
हाईकोर्ट ने BNS में दी गई Unlawful Assembly की परिभाषा पर विचार किया। कोर्ट ने कहा कि पांच या उससे अधिक व्यक्तियों की सभा तभी “unlawful assembly” मानी जाएगी जब उसका सामान्य उद्देश्य (common object) कानून में निर्धारित परिस्थितियों में से किसी एक के अंतर्गत आता हो।
इन परिस्थितियों में, उदाहरण के लिए, आपराधिक बल या उसके प्रदर्शन के माध्यम से सरकार या किसी लोक सेवक को डराना, किसी कानून या कानूनी प्रक्रिया के पालन का विरोध करना, कोई mischief या अपराध करना, किसी संपत्ति अथवा अधिकार पर आपराधिक बल के माध्यम से कब्जा करना अथवा किसी व्यक्ति को ऐसा कार्य करने के लिए मजबूर करना शामिल है, जिसे करने के लिए वह कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।
केवल पांच या अधिक व्यक्तियों का एकत्र होना पर्याप्त नहीं
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी सभा को केवल इसलिए गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता कि उसमें पांच या उससे अधिक लोग मौजूद थे। सभा को BNS = CrPC के तहत “unlawful” बनाने के लिए कानून में निर्धारित common object और आवश्यक ingredients का मौजूद होना आवश्यक है।
अदालत ने पाया कि इस मामले में अभियुक्तों द्वारा किसी प्रकार का criminal force इस्तेमाल करने, कोई mischief अथवा अपराध करने, किसी संपत्ति या अधिकार पर कब्जा करने अथवा किसी व्यक्ति को उसके कानूनी अधिकार के विरुद्ध कार्य करने के लिए मजबूर करने जैसी परिस्थितियां सामने नहीं आईं।
Section 126(2) BNS (आईपीसी की धारा 341) के ingredients भी नहीं मिले
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि charge-sheet में Section 126(2) BNS (आईपीसी की धारा 341) के अपराध को आकर्षित करने वाले आवश्यक ingredients भी मौजूद नहीं थे।
इस आधार पर अदालत ने माना कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर याचिकाकर्ताओं को आपराधिक मुकदमे की पूरी प्रक्रिया से गुजारना उचित नहीं होगा।
Bhajan Lal के सिद्धांत का भी उल्लेख
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध निर्णय State of Haryana & Others v. Bhajan Lal & Others, 1992 Supp (1) SCC 335 में निर्धारित सिद्धांतों का उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि Section 528 BNSS (Section 482 CrPC) के तहत अधिकार का प्रयोग सामान्यतः सावधानी से किया जाना चाहिए। लेकिन यदि FIR, शिकायत और जांच के दौरान एकत्र सामग्री को समग्र रूप से देखने पर कोई अपराध बनता ही नहीं है, तो आरोपी को अनावश्यक रूप से मुकदमे की प्रक्रिया से गुजरने के लिए बाध्य करना उचित नहीं होगा।
Bhajan Lal के सिद्धांतों में वह स्थिति भी शामिल है जहां FIR या शिकायत में लगाए गए आरोप, भले ही पूरी तरह सही मान लिए जाएं, फिर भी उपर से देखने पर (prima facie) कोई अपराध नहीं बनाते।
हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया
सभी तथ्यों और रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद मद्रास हाईकोर्ट ने Crl.O.P. No.24299 of 2026 को allow कर दिया और Gudalur Judicial Magistrate के समक्ष लंबित STC No.201 of 2026 को याचिकाकर्ताओं के संबंध में क्वैश कर दिया।
संबंधित miscellaneous petitions को भी बंद कर दिया गया।
कानूनी महत्व
इस निर्णय का महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत यह है कि किसी सभा को “Unlawful Assembly” घोषित करने के लिए केवल व्यक्तियों की संख्या या उनके द्वारा लगाए गए नारे पर्याप्त नहीं हैं। यह देखना आवश्यक है कि सभा का common object BNS में निर्धारित किसी वैधानिक श्रेणी में आता है या नहीं और संबंधित अपराध के सभी आवश्यक ingredients उपलब्ध हैं या नहीं।
इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन की सामग्री से ऐसी परिस्थितियां स्थापित नहीं होती थीं जो सभा को BNS के अर्थ में unlawful assembly बनातीं। इसलिए आरोपियों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं था।
Case: P.P. Mohamed & Others v. State
Court: Madras High Court
Case No.: Crl.O.P. No. 24299 of 2026
Date of Judgment: 31 August 2026
Coram: Justice G.K. Ilanthiraiyan
Relevant Provisions: Sections 189(2), 126(2) BNS; Section 528 BNSS
Result: Criminal proceedings in STC No.201 of 2026 quashed against the petitioners.
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