मामला: Pintu Gupta v. State of U.P.
क्रिमिनल अपील नं. 4083/2017
न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
निर्णय: 28 जुलाई 2022
पीठ: न्यायमूर्ति डॉ. कौशल जयेंद्र ठाकेर एवं न्यायमूर्ति अजय त्यागी
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि SC/ST (Prevention of Atrocities) Act की धारा 3(2)(v) लागू करने के लिए मात्र यह तथ्य पर्याप्त नहीं है कि पीड़ित व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है। अभियोजन को यह साबित करना आवश्यक है कि अपराध पीड़ित की जाति के कारण किया गया था।
मामले के तथ्य
मामले में अभियुक्त पिंटू गुप्ता पर आरोप था कि उसने 29 जनवरी 2011 को संजू कुमार बेंवांशी के चेहरे पर तेजाब जैसा corrosive substance फेंक दिया, जिससे उसके चेहरे पर गंभीर जलने की चोटें आईं और कुछ समय के लिए उसकी दृष्टि भी प्रभावित हुई। घटना के बाद घायल को उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया और उसके पिता की ओर से FIR दर्ज कराई गई। अभियुक्त के विरुद्ध IPC की धारा 326 तथा SC/ST Act की धारा 3(2)(v) के तहत मुकदमा चला।
ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को IPC की धारा 326 के तहत 10 वर्ष के कठोर कारावास और ₹25,000 जुर्माने तथा SC/ST Act की धारा 3(2)(v) के तहत आजीवन कारावास और ₹10,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी।
उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निष्कर्ष
उच्च न्यायालय ने SC/ST Act की धारा 3(2)(v) की भाषा पर विचार करते हुए कहा कि इस धारा के तहत अपराध तभी बनता है जब IPC का संबंधित अपराध इस आधार पर किया गया हो कि पीड़ित SC/ST समुदाय का सदस्य है।
कोर्ट ने पाया कि:
- FIR में यह आरोप नहीं था कि हमला पीड़ित की जाति के कारण किया गया।
- पीड़ित की जाति के संबंध में आवश्यक दस्तावेजी साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया।
- किसी स्वतंत्र गवाह ने यह नहीं कहा कि अपराध जाति के आधार पर किया गया था।
- केवल पीड़ित के SC/ST समुदाय से संबंधित होने के आधार पर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि अपराध उसकी जाति के कारण हुआ।
कोर्ट ने Ram Das v. State of U.P., Dharmendra v. State of U.P., State of Gujarat v. Munna तथा Vishnu v. State of U.P. जैसे निर्णयों का भी उल्लेख किया और इसी सिद्धांत को दोहराया कि पीड़ित का SC/ST होना अपने-आप में धारा 3(2)(v) को आकर्षित नहीं करता।
न्यायालय ने विशेष रूप से कहा कि SC/ST Act में ऐसा कोई deeming provision नहीं है जिसके आधार पर केवल जाति के कारण अपराध किया गया मान लिया जाए। ट्रायल कोर्ट ने केवल पीड़ित की जाति के आधार पर धारा 3(2)(v) के तहत दोषसिद्धि कर दी थी, जिसे उच्च न्यायालय ने गलत माना।
IPC की धारा 326 के संबंध में फैसला
हालांकि, उच्च न्यायालय ने अभियुक्त को IPC की धारा 326 के आरोप से बरी नहीं किया। कोर्ट ने मेडिकल एवं मौखिक साक्ष्य पर विचार करते हुए पाया कि तेजाब से चेहरे पर हुई चोटें grievous hurt की श्रेणी में आती हैं और चेहरे का permanent disfiguration IPC की धारा 320 के तहत grievous hurt है। तेजाब से भरी कांच की बोतल का इस्तेमाल अपराध के हथियार/साधन के रूप में किया गया था। इसलिए धारा 326 के आवश्यक तत्व सिद्ध होते हैं।
सजा में कमी
उच्च न्यायालय ने सजा के प्रश्न पर reformative और corrective theory of punishment तथा doctrine of proportionality को ध्यान में रखा। कोर्ट ने माना कि परिस्थितियों को देखते हुए धारा 326 IPC के तहत दी गई 10 वर्ष की सजा और ₹25,000 का जुर्माना अत्यधिक कठोर था।
इसलिए न्यायालय ने:
10 वर्ष → 9 वर्ष का कारावास
₹25,000 → ₹2,000 जुर्माना
Default sentence → 1 माह
कर दिया।
निर्णय का कानूनी महत्व
यह निर्णय विशेष रूप से SC/ST Act की धारा 3(2)(v) के मामलों में महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभियोजन को केवल पीड़ित की जाति साबित करना पर्याप्त नहीं है; उसे यह भी स्थापित करना होगा कि अपराध करने का कारण या आधार पीड़ित का SC/ST समुदाय से होना था।
अर्थात्, “victim belongs to SC/ST” और “offence was committed because victim belongs to SC/ST” — दोनों अलग-अलग बातें हैं और दूसरी बात को साक्ष्य से साबित करना आवश्यक है। यह सिद्धांत धारा 3(2)(v) के तहत कठोर सजा, विशेषकर आजीवन कारावास, लगाए जाने के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SC/ST Act की धारा 3(2)(v) के तहत दोषसिद्धि समाप्त करते हुए अभियुक्त को उस आरोप से बरी किया, लेकिन IPC धारा 326 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी और सजा घटाकर 9 वर्ष कर दी।
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Judgment Down load in English
https://elegalix.allahabadhighcourt.in/elegalix/WebDownloadJudgmentDocument.do?judgmentID=9667783

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