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      सिक्योरिटी डिपॉजिट पर ब्याज न देने की शर्त वैध: सुप्रीम कोर्ट

      K

      Keshav Pathak

      Author
      23/07/2026
      5 mins read
      11 Views
      सिक्योरिटी डिपॉजिट पर ब्याज न देने की शर्त वैध: सुप्रीम कोर्ट
      Tags:ContractsSupreme CourtCommercial Law
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      संक्षेप में: अगर किसी सरकारी ठेके में साफ लिखा है कि सिक्योरिटी डिपॉजिट पर ब्याज नहीं मिलेगा, तो अदालतें उस शर्त को सिर्फ इसलिए नहीं बदल सकतीं कि बाद में यह ठेकेदार को भारी लगने लगे। सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया है — लेकिन एक बड़ी शर्त के साथ।

      राज्य सरकार बनाम एम/एस जय दुर्गा फिनवेस्ट प्राइवेट लिमिटेड मामले में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें हरियाणा सरकार को सिक्योरिटी डिपॉजिट पर ब्याज देने का निर्देश दिया गया था।

      विवाद की जड़: खनन ठेके की एक शर्त

      यह मामला हरियाणा सरकार द्वारा दिए गए एक खनन ठेके से जुड़ा है, जहां ठेकेदार कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट के तहत एक सिक्योरिटी डिपॉजिट जमा करना था। ऐसे खनन ठेकों में सिक्योरिटी डिपॉजिट की व्यवस्था इसलिए रखी जाती है ताकि ठेका खत्म होने पर बकाया रॉयल्टी, पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई या अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन जैसी स्थितियों में सरकार के पास एक सुरक्षित राशि मौजूद रहे। ठेके की शर्तों में ही साफ लिखा था कि इस डिपॉजिट पर कोई ब्याज नहीं मिलेगा। ठेका खत्म होने के बाद जब डिपॉजिट लौटाने की बात आई, तो कंपनी ने तर्क दिया कि इतने लंबे समय तक रकम रोके रखने पर ब्याज न देना अनुचित और लोकनीति (public policy) के खिलाफ है।

      पहलू पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का रुख सुप्रीम कोर्ट का रुख
      "ब्याज नहीं" वाली शर्त अनुचित और अमान्य करार दी वैध और लागू करने योग्य ठहराया
      कोर्ट की भूमिका रिट क्षेत्राधिकार में शर्त बदलकर ब्याज का आदेश दिया कहा — रिट कोर्ट व्यावसायिक अनुबंध दोबारा नहीं लिख सकते
      देरी से भुगतान की स्थिति अलग से संबोधित नहीं तय अवधि के बाद रकम रोकने पर ब्याज देय होगा

      कोर्ट ने क्यों कहा — शर्त वाजिब है

      अदालत ने कहा कि दोनों पक्षों ने स्वेच्छा से इस शर्त को स्वीकार करते हुए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे, और केवल इसलिए कि एक पक्ष को अब यह शर्त बोझिल लगती है, उसे लोकनीति के विरुद्ध नहीं ठहराया जा सकता।

      सुप्रीम कोर्ट का तर्क था कि व्यावसायिक अनुबंधों में पक्षों को अपनी शर्तें खुद तय करने की आजादी होती है, और अदालतें — खासकर रिट क्षेत्राधिकार में काम करते हुए — इन शर्तों की समीक्षा किसी सामान्य अपील की तरह नहीं कर सकतीं। अगर कोई शर्त कानून के तहत गैरकानूनी नहीं है, और दोनों पक्षों ने उसे समझकर स्वीकार किया है, तो सिर्फ नतीजा एक पक्ष के खिलाफ जाने से वह शर्त अमान्य नहीं हो जाती।

      लेकिन एक बड़ी छूट भी दी गई

      अपवाद ध्यान रखें: अगर अनुबंध में यह भी लिखा है कि ठेका खत्म होने के बाद एक तय समय-सीमा के भीतर सिक्योरिटी डिपॉजिट लौटाया जाएगा, और वह समय-सीमा पार करते हुए रकम रोकी जाती है, तो उस देरी की अवधि पर ब्याज देना ही होगा। "ब्याज नहीं" वाली शर्त सिर्फ सामान्य अवधि पर लागू होती है, समय पर भुगतान न करने की गलती पर नहीं।

      यानी सरकार या कोई भी पक्ष इस फैसले की आड़ लेकर मनमाने ढंग से पैसा रोक नहीं सकता। अगर अनुबंध में वापसी की समय-सीमा तय है, तो उसे पार करना अब भी महंगा पड़ेगा — भले ही मूल डिपॉजिट पर ब्याज न देने का प्रावधान वैध हो।

      "अनुबंध की पवित्रता" का सिद्धांत क्या कहता है

      भारतीय अनुबंध कानून की एक बुनियादी मान्यता यह है कि जब दो सक्षम पक्ष स्वेच्छा से किसी शर्त पर सहमत होकर हस्ताक्षर करते हैं, तो अदालतें आमतौर पर उस सौदे में हस्तक्षेप नहीं करतीं — इसे "फ्रीडम ऑफ कॉन्ट्रैक्ट" या अनुबंध की स्वतंत्रता कहा जाता है। अपवाद सिर्फ तब बनता है जब कोई शर्त किसी कानून का सीधा उल्लंघन करती हो, धोखे या दबाव में करवाई गई हो, या इतनी एकतरफा हो कि उसे "अनकांशनेबल बार्गेन" यानी विवेकहीन सौदा माना जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में साफ किया कि सिर्फ ब्याज न मिलना किसी शर्त को स्वतः ही विवेकहीन नहीं बना देता, खासकर तब जब यह शर्त शुरू से ही अनुबंध में साफ-साफ लिखी हो और दोनों पक्षों ने बिना किसी दबाव के उसे स्वीकार किया हो। रिट क्षेत्राधिकार, जो मूल रूप से मौलिक अधिकारों की रक्षा और प्रशासनिक ज्यादतियों को रोकने के लिए है, उसका इस्तेमाल दो निजी पक्षों के बीच हुए व्यावसायिक सौदे को दोबारा लिखने के लिए नहीं किया जा सकता — यही इस फैसले का मूल संदेश है।

      ठेकेदारों और कंपनियों के लिए इसका मतलब

      यह फैसला भारत में सरकारी और निजी दोनों तरह के बड़े ठेकों पर सीधा असर डालेगा। जो कंपनियां किसी भी सरकारी अनुबंध पर हस्ताक्षर करने जा रही हैं, उन्हें अब सिक्योरिटी डिपॉजिट, ब्याज और वापसी की समय-सीमा से जुड़ी शर्तों को हस्ताक्षर से पहले ही बहुत ध्यान से पढ़ना होगा — क्योंकि बाद में अदालत में जाकर इन शर्तों को बदलवाना अब पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। साथ ही, यह फैसला सरकारी विभागों को भी यह याद दिलाता है कि "ब्याज नहीं" वाली शर्त उन्हें समय पर भुगतान की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती। कुल मिलाकर, यह फैसला अनुबंध की पवित्रता (sanctity of contract) को मजबूत करता है, लेकिन साथ ही यह भी दिखाता है कि सुप्रीम कोर्ट व्यावसायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाकर चलना चाहता है।

      सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों के लिए सबक

      यह फैसला सिर्फ निजी कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि खुद सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों के लिए भी एक चेतावनी की तरह है। अक्सर देखा गया है कि सरकारी एजेंसियां ठेकेदारों की सिक्योरिटी डिपॉजिट या अन्य राशियां तय समय से काफी आगे तक रोके रखती हैं, यह मानकर कि "ब्याज नहीं" वाली शर्त उन्हें हर तरह की जवाबदेही से बचा लेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने उस धारणा को खारिज कर दिया है। अब हर विभाग को अनुबंध में तय वापसी की समय-सीमा का सख्ती से पालन करना होगा, क्योंकि समय-सीमा पार करने पर ब्याज देने से बचने का कोई कानूनी बहाना नहीं बचता। इस तरह यह फैसला ठेकेदारों और सरकार, दोनों पक्षों के लिए एक साफ संदेश छोड़ता है — अनुबंध जो कहता है, उसका सम्मान दोनों तरफ से होना चाहिए।

      https://www.sajjadhusainlawassociates.com

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