sajjadhusainlawassociates@gmail.com|+91 7080909786
|
/
Sajjad Husain Law Associates

Sajjad Husain LawSajjad Husain Law Associates

Excellence in Legal Services

HomeHome
Bare ActsBare Acts
CrimeCrime
High CourtHigh Court
Latest NewsLatest News
Legal ArticlesLegal Articles
Supreme CourtSupreme Court
MoreMore
Sajjad Husain Law Associates

Sajjad Husain Law Associates

Excellence in Legal Services

Dedicated to providing exceptional legal services with integrity, expertise, and commitment to justice.

Get it on Google PlayDownload on App Store

Block-C, High Court,Advocates Chamber.515,
Lucknow - Ayodhya Rd, Gomti Nagar, Lucknow 226010

+91 70809 09786sajjadhusainlawassociates@gmail.com

Follow Us

Categories

    Sub Categories

      Resources

      • About Us
      • Contact Us
      • Advertise With Us
      • Careers
      • Privacy Policy
      • Terms & Conditions
      • Cookie Policy
      • Disclaimer
      • Editorial Policy

      © 2026 Sajjad Husain Law Associates. All Rights Reserved.

      PrivacyTermsContact

      सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किए असम के 27 'विदेशी घोषित' आदेश, कहा — बिना जांच फैसला नहीं

      K

      Keshav Pathak

      Author
      22/07/2026
      5 mins read
      20 Views
      सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किए असम के 27 'विदेशी घोषित' आदेश, कहा — बिना जांच फैसला नहीं
      Tags:AssamCitizenshipSupreme Court
      SHARE ARTICLE

      Listen to this Article

      Dual Host (Female & Male)
      0:00 / 0:00

      असम के किसी गांव में एक व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि उसके खिलाफ विदेशी घोषित करने की कार्यवाही चल रही है। नोटिस या तो सही पते पर नहीं पहुंचता, या भाषा और प्रक्रिया की जटिलता में वह समझ ही नहीं पाता कि पेश होना कितना जरूरी है। नतीजा — ट्रिब्यूनल उसकी अनुपस्थिति में ही उसे "विदेशी" करार दे देता है, और वह व्यक्ति रातोंरात अपनी ही नागरिकता खो बैठता है।

      13 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही 27 मामलों में पारित एकपक्षीय (ex parte) आदेशों को रद्द कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने साबित्री डे उर्फ स्वस्ती डे एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाया।

      ट्रिब्यूनल सिर्फ एक "डाकघर" नहीं है

      सुप्रीम कोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण अवलोकन यह था कि विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) महज एक फॉरवर्डिंग अथॉरिटी नहीं है, जो पुलिस या प्रशासन की राय पर मुहर लगा दे। कोर्ट ने कहा कि यह एक अर्ध-न्यायिक मंच (quasi-judicial forum) है, और भले ही प्रस्तावित व्यक्ति (proceedee) सुनवाई में हाजिर न हो, ट्रिब्यूनल को खुद संतुष्ट होना जरूरी है कि सारी प्रक्रिया निष्पक्षता से पूरी हुई है।

      अदालत ने कहा कि नागरिकता तय करने जैसे गंभीर मामले में निष्पक्ष सुनवाई के बिना कोई फैसला नहीं दिया जा सकता, और ट्रिब्यूनल को हर एकपक्षीय कार्यवाही में खुद संतुष्ट होना होगा कि नोटिस सही तरीके से तामील हुआ, आरोप के मुख्य आधार बताए गए, और सबूतों की समीक्षा कर उचित कारण दर्ज किए गए।

      पहले क्या होता था, अब क्या जरूरी होगा

      पहलू पुरानी, यांत्रिक प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट का मानक
      नोटिस की तामील अनुपस्थिति को ही स्वीकृति मान लिया जाता ट्रिब्यूनल को स्वयं जांचना होगा कि नोटिस वाकई सही तरीके से पहुंचा
      आरोप की जानकारी अक्सर स्पष्ट नहीं होती थी आरोप के मुख्य आधार व्यक्ति को बताए जाने अनिवार्य
      फैसले का आधार पुलिस रिपोर्ट पर सीधी मुहर सबूतों की स्वतंत्र समीक्षा और लिखित कारण जरूरी
      क्यों जरूरी है यह फर्क: "विदेशी" घोषित होने के बाद व्यक्ति को हिरासत केंद्र भेजा जा सकता है और मताधिकार सहित नागरिकता से जुड़े सभी अधिकार खतरे में पड़ जाते हैं। एक यांत्रिक, बिना जांचे-परखे आदेश किसी असली भारतीय नागरिक की जिंदगी उलट सकता है।

      विदेशी न्यायाधिकरण असल में हैं क्या

      विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) कोई सामान्य अदालत नहीं है, बल्कि विदेशी अधिनियम, 1946 के तहत बनाई गई एक अर्ध-न्यायिक व्यवस्था है, जो खासतौर पर असम में सक्रिय है। इनका काम यह तय करना है कि पुलिस या प्रशासन द्वारा "संदिग्ध विदेशी" के तौर पर चिन्हित किया गया कोई व्यक्ति असल में भारतीय नागरिक है या नहीं। दशकों से चली आ रही इस प्रक्रिया में सबूत जुटाने और साबित करने की जिम्मेदारी — यानी बर्डन ऑफ प्रूफ — आम आपराधिक मामलों से उलट, संबंधित व्यक्ति पर ही डाली जाती है। यानी व्यक्ति को खुद साबित करना होता है कि वह विदेशी नहीं, भारतीय नागरिक है। इसी वजह से नोटिस की सही तामील और निष्पक्ष सुनवाई का महत्व कई गुना बढ़ जाता है — क्योंकि अगर शुरुआत में ही प्रक्रिया गड़बड़ हो जाए, तो व्यक्ति के पास अपनी बात रखने का मौका ही नहीं बचता।

      सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई मौकों पर विदेशी न्यायाधिकरणों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा चुका है, खासकर तब जब कम पढ़े-लिखे या आर्थिक रूप से कमजोर लोग जटिल दस्तावेजी मांगों को पूरा नहीं कर पाते। ताजा फैसला इसी सिलसिले की एक और कड़ी है, जो अब हर ट्रिब्यूनल के लिए एकपक्षीय सुनवाई में भी न्यूनतम सावधानी बरतना अनिवार्य बना देता है।

      27 मामलों का क्या होगा अब

      सुप्रीम कोर्ट ने सभी 27 मामलों को संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों के पास वापस भेज दिया है, ताकि उन पर नए सिरे से सुनवाई हो। कोर्ट ने संबंधित व्यक्तियों को अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने का एक आखिरी मौका देने का भी निर्देश दिया। इसका मतलब यह नहीं है कि इन सभी 27 लोगों को अपने-आप नागरिक मान लिया गया है — बल्कि उन्हें अब निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत अपनी बात रखने और सबूत पेश करने का मौका मिलेगा, जो एकपक्षीय कार्यवाही में उन्हें नहीं मिला था।

      असम के लिए इसके व्यापक मायने

      असम में नागरिकता का सवाल दशकों से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है, जहां लाखों लोगों के दस्तावेज और वंशावली जांच के दायरे में आते रहे हैं। ऐसे माहौल में विदेशी न्यायाधिकरणों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है, क्योंकि इन्हीं की राय के आधार पर तय होता है कि कोई व्यक्ति नागरिक है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य के हर उस मामले पर असर डालेगा जहां व्यक्ति किसी वजह से सुनवाई में हाजिर नहीं हो पाता — चाहे वजह गरीबी हो, जानकारी की कमी हो, या दूर-दराज इलाके में रहना हो। अब ट्रिब्यूनल को यह मान लेने का अधिकार नहीं होगा कि अनुपस्थिति ही दोष का सबूत है; उसे हर कदम पर खुद को संतुष्ट करना होगा कि प्रक्रिया निष्पक्ष रही। यही फर्क आने वाले समय में हजारों संदिग्ध मामलों की सुनवाई की दिशा तय कर सकता है।

      हिरासत केंद्रों में बंद लोगों के लिए क्या बदलेगा

      असम में जिन लोगों को विदेशी घोषित किया जाता है, उनमें से कई को ट्रांजिट या हिरासत केंद्रों में रखा जाता है, जब तक कि निर्वासन की प्रक्रिया पूरी न हो या मामला किसी उच्चतर अदालत में लंबित न रहे। बरसों तक ऐसे केंद्रों में रहना खुद में एक बड़ी मानवीय त्रासदी बन जाता है, खासकर तब जब बाद में पता चलता है कि व्यक्ति असल में भारतीय नागरिक ही था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सीधा असर उन परिवारों पर भी पड़ेगा, जिनके सदस्य ऐसे हिरासत केंद्रों में बंद हैं — नए सिरे से हो रही सुनवाई में उन्हें सबूत जुटाने, गवाह पेश करने और वंशावली से जुड़े दस्तावेज दिखाने का एक वास्तविक मौका मिलेगा, जो एकपक्षीय कार्यवाही में संभव नहीं हो पाया था।

      कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आने वाले समय में असम के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी नागरिकता से जुड़े विवादों में एक संदर्भ-बिंदु के तौर पर इस्तेमाल हो सकता है, क्योंकि "निष्पक्ष सुनवाई के बिना कोई फैसला नहीं" का सिद्धांत सिर्फ विदेशी न्यायाधिकरणों तक सीमित नहीं, बल्कि हर अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया पर लागू होता है।

      https://www.sajjadhusainlawassociates.com

      Related Articles

      Related Articles