इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लोकसभा में नेता विपक्ष Rahul Gandhi के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका उनके “Indian State से लड़ाई” वाले बयान को लेकर दाखिल की गई थी।
कोर्ट ने साफ कहा कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों या फैसलों की आलोचना करना न केवल अनुमति प्राप्त है बल्कि जरूरी भी है। सिर्फ आलोचना करना या विचारों में मतभेद होना कोई अपराध नहीं होता।
कोर्ट ने समझाया कि जब कोई चुना हुआ जनप्रतिनिधि “लड़ाई” शब्द का इस्तेमाल करता है, तो उसका मतलब आमतौर पर शारीरिक लड़ाई नहीं होता, बल्कि किसी नीति या विचार के खिलाफ मजबूती से विरोध करना होता है।
इस मामले में जस्टिस विक्रम डी चौहान की बेंच ने यह भी कहा कि राहुल गांधी एक चुने हुए प्रतिनिधि हैं और उन्होंने यह बात एक इंटरव्यू में कही थी, इसलिए इसे सामान्य अभिव्यक्ति (free speech) माना जाएगा।
याचिकाकर्ता का कहना था कि इस बयान से देश की एकता और अखंडता को खतरा है और यह कानून (Section 152 BNS) के तहत अपराध है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि सिर्फ शक के आधार पर किसी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रही कि इस बयान से किसी प्रकार का विद्रोह, अलगाववाद या देश के खिलाफ गतिविधि को बढ़ावा मिला हो।
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom of speech) संविधान का एक महत्वपूर्ण अधिकार है, और जब तक कोई बयान सीधे तौर पर हिंसा या विद्रोह के लिए उकसाता नहीं है, तब तक उसे अपराध नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी बताया कि लोकतंत्र में अलग-अलग विचारों का आदान-प्रदान बहुत जरूरी है। अगर लोगों को बोलने से रोका जाएगा, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा।
अंत में कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह लगे कि राहुल गांधी के बयान से देश की एकता को खतरा हुआ है या किसी तरह का विद्रोह भड़काया गया है। इसलिए याचिका खारिज कर दी गई।
